लाल चींटी की चटनी खाते हैं यहां के लोग, ठंड से बचाव के लिए करते हैं इस्ते माल

आपने कई तरह की चटनी खाई या फिर उनके नाम सुने होंगे, लेकिन आज हम आपको जंगल के पेड़ों में ठंड के दिनों पाई जाने वाली लाल चींटी की चटनी के बारे में बताने जा रहे हैं|

आदिवासी लोगों की मान्यता है, कि अगर ठंड के दिनों में यह चटनी खाई जाए तो ठंड भी नहीं लगेगी, और भूख भी अच्छे से बढ़ जाएगी| इसमें एक तरह का खास एसिड होता है, जो शरीर के लिए लाभदायक होता है|

जमशेदपुर से करीबन 70 किलोमीटर दूर घने जंगलों के बीच बसा यह आदिवासी समाज का गांव आम सुख- सुविधा से अभी भी कोसों दूर है| 

आदिवासी लोगों की मान्यता

यहां के लोगों का कहना है, कि ठंड पड़ते ही लाल चींटी यहां के साल और करंज के पेड़ों पर अपना घर बना लेती है, जो चारों तरफ पत्‍तों से ढका होता है|

चींटी का जब पेड़ पर आना-जाना शुरू हो जाता है, फिर गांव के लड़के पेड़ पर चढ़ कर इनके घरोंदे को टहनी समेत तोड़ कर लाते हैं|

इसके बाद एक हांडी में झाड़ा जाता है, जिससे सभी चींटियों को एक जगह किया जा सके|

इसके बाद घर की महिलाओं द्वारा पत्थर की सि‍ल पर और उसमें नमक, मिर्च, लहसुन आदि मिलाकर काफी बारीक पिसाई कर लाल चींटी की चटनी तैयार की जाती है|

फिर घर के सभी लोगों को साल के पत्ते पर इस चटनी को परोसा जाता है| एक साल के बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक सभी इसको खाते हैं| 

साल में एक बार आती हैं चीटियाँ

लोगों के अनुसार, यह लाल चींटी पेड़ों पर साल में एक बार ही आती हैं, और इस की चटनी को हमारे पूर्वज भी खाया करते थे|

यह चटनी खाने में भी बहुत अच्छी लगती है, इस लिए हम लोग अपने को स्‍वस्‍थ रखने के लिए लाल चींटी की चटनी खाते हैं| इसको यहाँ की लोकल भाषा में लोग कुरकु भी कहते हैं|

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