जूता मार होली: हर साल यहां खेला जाता है अलग तरह का त्यौहार, जाने दिलचस्प बातें!

मथुरा के बरसाना और नंदगांव की ‘लट्ठमार होली’ की तरह शाहजहांपुर जिले में हर साल होली के दिन खेली जाने वाली ‘जूता मार होली’ की भी अपनी एक अलग पहचान है|

बता दें, कि होली के दिन भैंसा गाड़ी पर निकलने वाले जुलूस में ‘लाट साहब’ मुख्‍य आकर्षण होते हैं|


भैंसा गाड़ी पर लाट साहब

स्थानीय लोगों के मुताबिक, होली वाले दिन यहां ‘लाट साहब’ का जुलूस निकलता है और उन्हें भैंसा गाड़ी पर तख्त डालकर बिठाया जाता है| लाट साहब का जुलूस बड़े ही गाजे-बाजे के साथ निकलता है और इस दौरान लाट साहब की जय बोलते हुए होरियारे द्वारा उन्हें जूतों से मारा जाता है|

इसके पीछे की कहानी के अनुसार, ”शाहजहांपुर शहर की स्थापना करने वाले नवाब बहादुर खान के वंश के आखिरी नवाब अब्दुल्ला खान पारिवारिक लड़ाई के चलते फर्रुखाबाद चले गए, और 1729 में 21 साल की उम्र में वो वापस शाहजहांपुर आए|

वह हिंदू-मुसलमान दोनों ही समुदायों के बेहद प्रिय थे, और इसी बीच होली का त्योहार आया तो दोनों समुदाय के लोग उनसे मिलने के लिए घर के बाहर खड़े हो गए| नवाब साहब जब बाहर आए तो लोगों ने होली खेली, और इसके बाद उन्हें ऊंट पर बैठाकर शहर का एक चक्कर लगाया गया इसके बाद से यह परंपरा बन गई|

कहा जाता है कि 1857 तक हिंदू- मुस्लिम दोनों मिलकर यहां होली का पर्व बड़े ही धूमधाम से मनाते थे, परंतु हिंदू मुस्लिम का यह सौहार्द प्यार अंग्रेजों को पसंद नहीं आया|

अंग्रेजों की फूट डालो और राज करो  नीति

इतिहासकारों के मुताबिक, अंग्रेजों की फूट डालो और राज करो  नीति के तहत आखिरकार 1858 में बरेली के सैन्य शासक खान बहादुर खान के सैन्य कमांडर मरदान अली खान ने एक टुकड़ी के साथ शाहजहांपुर में हिंदुओं पर हमला कर दिया और फिर शहर में सांप्रदायिक तनाव हो गया|

लाट साहबनाम की कहानी

जानकारी के अनुसार, 1947 के बाद प्रशासन ने नवाब साहब के जुलूस का नाम बदल कर ‘लाट साहब’ कर दिया और तब से यह लाट साहब के नाम से जाना जाने लगा|

इसी दौरान अंग्रेज तो यहां से चले गए लेकिन अंग्रेजों के प्रति लोगों में जो आक्रोश था उससे ही इस नवाब के जुलूस का रूप जूता मार होली के रूप में काफी विकृत हो गया|

बता दें, कि लाट साहब का यह जुलूस चौक कोतवाली स्थित फूलमती देवी मंदिर से निकलता है और वहां लाट साहब मंदिर में पूजा अर्चना करते हैं|

कोतवाली में सलामी लेते हुए इसके बाद बाबा विश्वनाथ मंदिर में पहुंचते हैं और फिर यह जुलूस चौक में ही आकर समाप्त हो जाता है|

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